सोशल नेटवर्किंग पर बाढ़ आयी हुई होती हैं अब लोग अपने ज्यादातर पैसे कमाने के काम को डिजिटल कर रहे हैं ऐसे ही अद्यात्मिक जानकारी और उसके जानकार भी बोहोत तादाद मे बढ़ रहे हैं।
इसका दुरूपयोग भी काफ़ी मात्रा में हो रहा हैं, लोग बड़ी से बड़ी साधना की जानकारी कुछ तो ऐसे ही बंथ रहे हैं।
और कुछ छोटी सी जानकारी को भी बढ़ा चढ़ा कर लिख देते हैं और पैसे की मांग करते हैं।
ऐसे ही आज एक पोस्ट देख सज्जन ने लिखा हुआ था "किसी भी मंत्र की काट के लिए या उसे सिखने के लिए विश्वास के साथ सम्पर्क करे,
लेकिन फ्री वाले दूर रहे।
किसी अल्प बुद्धि जीवी ने उसका उत्तर लिखा की "जो पैसे लेके तंत्र मंत्र करे वो सबसे बड़ा भिखारी, असली गुरु कभी पैसे नहीं मांगते"
सही लिखा उसने असली गुरु दक्षिणा में कुछ भी मांग लेते है।
इसका उत्तर मैंने दिया की।
फ्री का मतलब ये नहीं की पैसे की ही मांग हो।
दक्षिणा का कोई रूप नहीं होता अगर कोई सीधा पैसे ही मांग रहा हैं वो भी मुँह मांगे तो ये गलत हैं सच्चा साधक कभी पैसे तो क्या किसी भी वस्तु की मांग नहीं करता और दक्षिणा स्वरूप जो सामर्थ्य हो वो दे देने का विधान हैं।
और जब किसी की सच में जान पर बनी हो तो वो इंसान यही कहता हैं की पैसे कितने भी ले लो बस बचा लो।
लेकिन आज के हालात इसके विपरीत ही हैं पैसे वाले भी जान नहीं बचा पर रहे।
खैर
कर्म का फल होता हैं भौतिक भी और सूक्ष्मम भी अब वो देने वाले की बुद्धि पर निर्भर करता हैं।
अब अगर किसी ने तंत्र की काट करने के बदले में आपसे किसी ने आपकी भौतिक रूप शारीरिक सेवा मांग ली की 6 महीने के लिए मंदिर की सफाई तुम ही करोगे।
और सूक्ष्म रूप दक्षिणा में कह दिया की एक साल तक कोई मंत्र जाप करो मेरे नाम से संकलप लेकर।
ऐसे में पैसे का क्या काम, और अगर कोई पैसे देकर तंत्र सिख ही रहा हैं तो बाद में हो सकता हैं वो उसे अपने जीवन यापन का तरीका ही बनाएगा जीवन यापन पैसे से ही होता है।
और तंत्र सीखना बच्चों का खेल नहीं हैं।
तलवार की धार पर पड़ी शहद की बूँद हैं जिसका जीभ से स्वाद भी चखना हैं हुए जीभ ना काट जाये ये ध्यान भी रखना हैं।
और तंत्र मार्ग में वापसी का कोई रास्ता नहीं होता, और तंत्र की काट करने का मतलब हैं अँधेरे से भरी गहरी खायी में बिना रस्सी और रोशनी के कूदना।
बातों की गहराई में जाना चाइये और भिखारी तो सब हैं सब भिखारी ही हैं कोई नर से मांगता रहता हैं तो कोई नारायण से।
जय भगवती जी की🙏
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